इस प्रकार यह शुरू होता है ...

अच्छाई और बुराई के बीच असंतुलन

सार्वभौमिक संतुलन को देवताओं और राक्षसों के परस्पर युद्ध के कारण बना हुआ था। चूँकि ऋषि दुर्वासा का अपमान भगवान इन्द्र के द्वारा किये जाने के बाद देवताओं ने अपनी शक्ति खोनी शुरू कर दी थी | परिणामस्वरुप, अच्छाई और बुराई की ताकतों के बीच का नाजुक सार्वभौमिक संतुलन बिगड़ गया था।

भगवान विष्णु से

परामर्श

दुनिया में बुराई व्याप्त हो जाने के डर से, देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद की गुहार लगाई। भगवान ब्रह्मा जानते थे कि सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु ही देवताओं का मार्गदर्शन कर सकते हैं। भगवान ब्रह्मा के नेतृत्व मे, देवताओं ने भगवान विष्णु से मार्गदर्शन के लिए संपर्क किया।

समाधान

अपनी चंचल बुद्धि के लिए प्रसिद्ध भगवान विष्णु ने सुझाव दिया कि देवताओं और राक्षसों को एक साथ मिल जाना चाहिए और अपनी गहराई में छिपे धन को प्रकट करने के लिए क्षीरसागर नामक दूध के सागर का मंथन करना चाहिए। इस प्रकार प्रकट हुए कुम्भ या अमृत के घड़े से, देवताओं को उनकी खोई हुई शक्ति वापस पाने में मदद मिलेगी।

पारस्परिक अनुबन्ध

मंथन द्वारा प्राप्त होने वाले धन के वादे से लुभते हुए, दानवों को देवताओं के साथ गठबंधन बनाने में लाभ दिखा | कारण यह था कि देवताओं या दानवों दोनों में से किसी भी वर्ग के लिए अकेले मंथन करना संभव नहीं था । इस प्रकार, उन्होंने अपने बीच मंथन से प्रकट हुई वस्तुओं को साझा करने के लिए देवताओं के साथ एक संधि की।

मंथन

इस प्रकार 'समुद्र मंथन' नामक प्रसंग का आरम्भ हुआ। सर्पराज वासुकी मंथन करने वाला रस्सा बना, जबकि मंथन करने वाला विशाल पर्वत मन्दराचल था। कई अन्य चीजें, कुल मिलाकर १४, मंथन द्वारा उत्पन्न की गईं। हालांकि, देवताओं को गुप्त रूप से एक प्रतिष्ठित पुरस्कार - अमृत, या अमरत्व और अमरता की प्रतीक्षा थी।

उथल-पुथल

मंथन से प्रकट होने वाली अंतिम वस्तु दिव्य चिकित्सक धनवंतरी थे । उनके हाथों में अमृत कलश था, जिसे कुम्भ कहा गया | देवताओं ने जल्दी से इसे जब्त कर लिया। राक्षसों से बचाने के लिए, भगवान विष्णु की सवारी गरुड़ ने कुम्भ के साथ उड़ान भरी। राक्षसों ने समझ लिया कि उनके साथ छल किया गया है, इसके बाद उन्होंने उनका पीछा किया | बारह दिनों और बारह रातों (पृथ्वी के बारह वर्षों के बराबर) में देवताओं और राक्षसों ने अमृत कलश के अधिकार के लिए आकाश में लड़ाई लड़ी।

एक प्रथा का जन्म

इस उथल-पुथल में, अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों पर छलकी - प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक, और इस प्रकार, विश्व की सबसे प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक का जन्म हुआ। यह माना जाता है कि उसी अमृत की कुछ बुँदे पानी में गिरी, जो न केवल ठीक कर सकता है और अच्छा बना सकता है, बल्कि लोगों के पाप को भी धो सकता है और इस तरह मोक्ष के मार्ग मे मदद कर सकता है।

उपसंहार

दानव काफी ताकतवर थे और दुर्बल देवता उनके लिए कोई प्रतिद्वन्दी साबित नहीं हो रहे थे। इस बात से चिंतित थे कि दानवों के अमृत पीने और ब्रह्मांड पर प्रभुत्व स्थापित करने की सम्भावना से चिन्तित, भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया, जो अनुपम सौन्दर्य की एक दिव्य अप्सरा थी| उसने देवताओं और राक्षसों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठने के लिए कहा और उन्हें अमृतपान कराने का प्रस्ताव दिया। दिव्य सौन्दर्य से मुग्ध दानव अमृतपान के लिए सहमत हुए। हालांकि, मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया और जैसे ही देवता पी चुके, वह गायब हो गयी। दानव अपने साथ हुए छल से आक्रोशित हुए, लेकिन पुनः ऊर्जावान देवताओं ने उन्हें खदेड़ दिया। क्योंकि अमृत को 'सुरा' भी कहा जाता है, दानवों को 'असुर', या जो अमृत से वंचित होते हैं, कहा जाता है।

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