इतिहास में कुम्भ

सर्वप्रथम विवरण

कुछ विद्वानों के अनुसार, वर्तमान में प्रयाग में होने वाले कुम्भ मेले का सबसे पुराना जीवित इतिहास, ६४४ ईसा पूर्व का है, जब चीनी यात्री ह्युन त्सांग ने सम्राट शिलादित्य द्वारा आयोजित एक नदी उत्सव का वर्णन किया। प्रयागराज का माघ मेला शायद सभी कुम्भ मेलों में सबसे पुराना है, और पुराणों में भी इसका संदर्भ मिलता है।

अखाड़ा विवरण

अखाड़ों द्वारा इस विश्वास का समर्थन किया जाता है कि आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्रयाग में कुम्भ मेले की शुरुआत की, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के धार्मिक पुरुषों की एक मण्डली बनाई जा सके।

मुगल पंचांग

१६९५ ई० में संकलित खुलासत-उत-तवारीख, निम्न मेलों की सूची देता है: हरिद्वार में हर १२ साल में एक मेला और वार्षिक मेला, हर १२ साल में त्रियम्बक में आयोजित एक मेला, और माघ में प्रयाग में आयोजित एक वार्षिक मेला।

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धर्म-प्रचारक विवरण

१८२४ के कुम्भ मेले से ईसाई ‍दीक्षा देने वाले गुरु मिशनरी जॉन चैंबरलेन के विवरणों में कहा गया है कि बड़ी संख्या में आगन्तुक व्यापार के लिए वहां आए थे, और मेले में बड़ी संख्या में सिखों सहित “हर धार्मिक व्यवस्था के आयामों” ने भाग लिया था।

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ब्रिटिश विवरण

इलाहाबाद में कुम्भ मेले का पहला ब्रिटिश संदर्भ १८६८ की एक रिपोर्ट में है, जिसमें जनवरी १८७० में आयोजित होने वाले “कूम्ब मेले” में तीर्थयात्रा और स्वच्छता नियंत्रण की आवश्यकता का उल्लेख है।

सनातन

एक समावेशी त्योहार

ब्रिटिश नागरिक सेवक रॉबर्ट मॉन्टगोमरी मार्टिन ने १८५८ के कुम्भ के बारे में उल्लेख किया है कि मेले में आगंतुकों के कई सम्प्रदाय और धर्मों के लोग शामिल थे। पुजारियों, सैनिकों, और धार्मिक पंडितों के अतिरिक्त, कई व्यापारियों द्वारा मेले में भाग लिया गया था, जिसमें बुखारा, काबुल, तुर्किस्तान, अरब और फारस के घोड़ा व्यापारी शामिल थे। कई हिन्दू राजाओं, सिख शासकों और मुस्लिम नवाबों ने मेले का दौरा किया। कुछ ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भी मेले में प्रचार किया था।

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परिमाण

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