नदियों का संगम

नदियों का संगम भारतीय पौराणिक और दार्शनिक चिन्तन का सार बताती हैं। वे भारतीय पौराणिक कथाओं में दिव्य त्रिमूर्ति के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि गंगा भगवान शिव, यमुना भगवान विष्णु और सरस्वती भगवान ब्रह्मा के साथ जुड़ी हुई हैं।

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हिन्दू मान्यता के अनुसार, गंगा नदी आकाश से पृथ्वी पर आई थी, जहां यह पवित्र भूमि से होकर बहती थी, जब तक कि कोसला के एक भारतीय राजा भागीरथ ने एक शक्तिशाली देवता भगवान ब्रह्मा से नदी को पृथ्वी पर लाने के लिए विनती की। उन्होंने अपने ६०,००० पूर्वजों की आत्माओं को शुद्ध करने का प्रयोजन किया था जिन्हें कपिलवस्तु नामक एक संत ने शाप दिया था।

गंगा

यह पवित्रता, विश्वास, आशा, संस्कृति और जीवन का प्रतीक है। यह प्राचीन काल से लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत है। भारतीय उप-महाद्वीप में और विशेष रूप से हिंदू धर्म में यह सामाजिक और धार्मिक परम्परा का केंद्र है। गंगा के लिए सम्मान भारतीय पहचान और भारतीय संस्कृति के प्रतीक का एक हिस्सा है।

मार्ग

जल आयतन के आधार पर यह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। जो भागीरथी और अलखनंदा धाराओं के संप्रवाह से निर्मित है। एक लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक का जल-प्रणाली क्षेत्र है। भारत के जल संसाधनों का एक-चौथाई हिस्सा है। ४०.७ करोड़ से अधिक भारतीयों, या भारतीय आबादी के कुछ एक-तिहाई लोगों का घर है।

उपदेश

हिंदुओं द्वारा इन्हें एक सम्मानित देवी माना जाता है। ये न केवल शरीर, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध करती हैं। संदर्भ के आधार पर, जीवन को लाने वाले और जीवन निर्वाह करने वाले इसे स्वर्ग जाने के मार्ग मानते है। संभवतः आज दुनिया में सबसे अधिक उपयोगी नदी है।

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इस नदी को हिन्दू देवी यमुना, या यमी, मृत्युदेव यम की जुड़वां बहन, के रूप में पूजा जाता है। जैसे-जैसे भारतीय संस्कृति विकास हुआ, कालिंदी नाम, जिसका अर्थ है गहरे रंग की, भी नदी के साथ जुड़ गया। भाई-दूज का त्यौहार जुड़वाँ यम और यमी के बीच अटूट भ्रातृ प्रेम के लिए एक श्रद्धांजलि के रूप में मनाया जाता है।

यमुना

यमुना नदी अपनी दिव्यता और सामाजिक स्थिति में गंगा के बाद दूसरे स्थान पर है। इसके तटों ने भारतीय इतिहास की सम्पूर्ण कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा देखा है और इसमें महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है।

मार्ग

गंगा की मुख्य सहायक नदी और भारत की सबसे बड़ी नदी जो समुद्र में नहीं गिरती है। हिमालय के यमुनोत्री ग्लेशियर में अपने उद्गम से १३७६ किलोमीटर की दूरी पर प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर गंगा नदी के साथ अपनी संगम यात्रा का मार्ग प्रशस्त करती है। इसका ३६६,२२३ वर्ग किलोमीटर का जल-प्रणाली क्षेत्र है, जो पूरे गंगा बेसिन का ४०% हिस्सा है।

उपदेश

इस नदी से कई महत्वपूर्ण भारतीय देव संबद्ध हैं | भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं के कई महत्वपूर्ण नगर इसके किनारे पर स्थित हैं। दिल्ली, आगरा, मथुरा और प्रयाग इसके कुछ उदाहरण हैं। यमुना की भूमिका भारतीय समाज की बनावट में निहित है, जो इसके इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक आभासी संगम कराती है।

किंवदंती है कि सरस्वती भगवान ब्रह्मा के माथे से एक सुंदर देवी के रूप में प्रकट हुईं। उसके भव्य रूप को देखकर, भगवान ब्रह्मा उसे अपना साथी बनाना चाहते थे। देवी सरस्वती, विद्या, बुद्धिमत्ता की प्रतीक और स्वतंत्र इच्छा की एक प्राणी थीं, यह विचार उन्हें पसंद नहीं आया। इसलिए वह बिना भगवान ब्रह्मा की नज़र में आये, गायब हो गई। यही कारण है कि इस नदी को भूमिगत प्रवाहित माना जाता है।

सरस्वती

सरस्वती शायद दुनिया की सबसे मायावी और रहस्यमयी नदी है। दुनिया भर के हिन्दुओं की सामूहिक चेतना का मूल आधार होने के साथ, यह तीसरी नदी है जो प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर इस संगम को पूरा करती है।

मार्ग

इतिहासकारों का मानना है कि लगभग ४००० साल पहले सरस्वती जमीन के ऊपर बहती थी, बाद में महाद्वीपीय खण्डों की गतिविधि के कारण पानी भूमिगत हो गया । इसकी कार्यप्रणाली १५०० किमी० लम्बी हुआ करती होगी और यह यमुना एवं सतलुज के बीच प्रवाहित होती होगी। यह अरब सागर से मिलने से पहले वर्तमान उत्तरांचल, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात से होकर बहती थी।

उपदेश

संक्षेप में, सरस्वती नदी का भारतीय पौराणिक कथाओं में प्रचुर उल्लेख है और भारतीय आध्यात्मिकता में एक पूजनीय स्थान है। वेदों ने इसे अम्बितमे-नादितमे-देवितमे के रूप में संदर्भित किया है। इसका तात्पर्य यह है कि सरस्वती ने तीन भूमिकाएँ निभाईं। एक माँ, एक नदी और एक देवी का, सभी एक इकाई में निहित हैं।

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